स्थानांतरण प्रमाणपत्र से उम्र तय नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि स्कूल द्वारा जारी किया गया स्थानांतरण प्रमाणपत्र यानी ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) किसी व्यक्ति की उम्र तय करने का वैध आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि टीसी जन्म प्रमाणपत्र का विकल्प नहीं है और इसे उम्र निर्धारण के लिए इस्तेमाल करना कानून के खिलाफ है। यह फैसला न केवल एक मामले तक सीमित है, बल्कि भविष्य में बालिग और नाबालिग से जुड़े कई विवादों में मार्गदर्शक साबित होगा।

स्थानांतरण प्रमाणपत्र से उम्र तय नहीं हो सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला

हाईकोर्ट का स्पष्ट दृष्टिकोण

न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति जफीर अहमद की खंडपीठ ने यह टिप्पणी उस समय की, जब कन्नौज की बाल कल्याण समिति द्वारा एक महिला को केवल स्कूल टीसी के आधार पर नाबालिग मानकर बाल गृह भेज दिया गया था। कोर्ट ने साफ कहा कि जेजे एक्ट की धारा 94 के तहत टीसी जन्म प्रमाणपत्र के आवश्यक कानूनी मानकों को पूरा नहीं करता।

कोर्ट का मानना था कि उम्र निर्धारण एक संवेदनशील कानूनी प्रक्रिया है, जिसे हल्के या अप्रमाणित दस्तावेजों के आधार पर नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति के पास जन्म प्रमाणपत्र, आधार कार्ड या मेडिकल जांच जैसी मजबूत और विश्वसनीय सामग्री मौजूद है, तो उन्हें प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि और तथ्य

यह मामला एक ऐसे दंपती से जुड़ा था जिन्होंने वर्ष 2023 में विवाह किया था। महिला ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि वह 19 वर्ष की है और बालिग है। उसके पास आधार कार्ड था और मेडिकल जांच रिपोर्ट में भी उसकी उम्र बालिग पाई गई थी। इसके बावजूद बाल कल्याण समिति ने केवल स्कूल के स्थानांतरण प्रमाणपत्र के आधार पर उसे नाबालिग मानते हुए कानपुर नगर स्थित सरकारी बालिका गृह भेज दिया।

इस आदेश के खिलाफ महिला और उसके पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की। उनका तर्क था कि महिला की स्वतंत्रता का हनन किया गया है और उसे अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है।

बाल कल्याण समिति की भूमिका पर सवाल

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में बाल कल्याण समिति की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने पाया कि समिति ने न तो स्कूल रिकॉर्ड की प्रामाणिकता की जांच की और न ही संबंधित विद्यालय के प्रधानाचार्य का बयान लिया। इसके अलावा दस्तावेजों को कानूनी प्रक्रिया के अनुसार प्रमाणित भी नहीं कराया गया।

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी व्यक्ति को हिरासत में भेजने से पहले सभी तथ्यों की निष्पक्ष और गहन जांच अनिवार्य है। केवल एक कागज के आधार पर किसी की उम्र तय करना और उसकी आज़ादी छीन लेना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

राज्य सरकार की आपत्ति और कोर्ट का जवाब

राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि बाल कल्याण समिति एक न्यायिक शक्तियों वाला प्राधिकरण है और उसके आदेश के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी प्राधिकरण द्वारा पारित आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर है या कानून के विपरीत है, तो हाईकोर्ट को उसमें हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है। ऐसे मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पूरी तरह से पोषणीय होती है।

जेजे एक्ट और उम्र निर्धारण की कानूनी स्थिति

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि किशोर न्याय अधिनियम में उम्र निर्धारण को लेकर स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। सबसे पहले जन्म प्रमाणपत्र, उसके बाद सरकारी दस्तावेज और अंत में मेडिकल जांच को महत्व दिया जाता है। स्कूल का टीसी इन मानकों में स्वतः फिट नहीं बैठता, जब तक कि उसकी वैधता और प्रमाणिकता विधिवत सिद्ध न की जाए।

यह फैसला उन मामलों में विशेष महत्व रखता है जहां विवाह, अपहरण या संरक्षण से जुड़े विवादों में उम्र को लेकर भ्रम पैदा किया जाता है।

आम लोगों के लिए इस फैसले का महत्व

यह निर्णय आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक मजबूत कदम है। इससे यह संदेश जाता है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को बिना ठोस और कानूनी आधार के सीमित नहीं किया जा सकता। खासकर महिलाओं के मामलों में यह फैसला उनकी स्वतंत्र इच्छा और संवैधानिक अधिकारों को मजबूती देता है।

निष्कर्ष और आगे की राह

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला कानून की सही व्याख्या और मानवाधिकारों की रक्षा का उदाहरण है। यदि किसी को उम्र या हिरासत से जुड़ी समस्या का सामना करना पड़ता है, तो उसे संबंधित दस्तावेजों के साथ न्यायालय का दरवाजा खटखटाने से हिचकना नहीं चाहिए।

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