स्कूल में घुसकर वीडियो बनाने का आरोप, शिक्षिका से 1.50 लाख की मांग

लखनऊ के गोमतीनगर इलाके से सामने आया यह मामला डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती ताकत और उससे जुड़ी जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत सहायक शिक्षिका ने एक महिला यूट्यूबर पर बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश करने, वीडियो रिकॉर्ड करने और बाद में उसे हटाने के बदले बड़ी रकम मांगने का आरोप लगाया है। इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

यह घटना न सिर्फ एक शिक्षिका की निजता से जुड़ी है, बल्कि स्कूल जैसे संवेदनशील स्थानों में कंटेंट क्रिएशन की सीमाओं और कानून की भूमिका को भी उजागर करती है।

स्कूल में घुसकर वीडियो बनाने का आरोप, शिक्षिका से 1.50 लाख की मांग

क्या है पूरा मामला

पीड़ित शिक्षिका के अनुसार यह घटना गोमतीनगर स्थित प्राथमिक विद्यालय राम आसरे पुरवा की है। बताया गया कि स्कूल समय के दौरान एक महिला यूट्यूबर बिना किसी पूर्व अनुमति या पहचान पत्र के विद्यालय परिसर में दाखिल हुई। उस समय विद्यालय में शिक्षिका के साथ अन्य स्टाफ सदस्य भी मौजूद थे।

आरोप है कि यूट्यूबर ने न सिर्फ शिक्षकों का बल्कि स्कूल परिसर का भी वीडियो रिकॉर्ड किया। जब उसे किसी तरह की आपत्तिजनक या नियमविरुद्ध गतिविधि नहीं मिली तो छुट्टी के समय बच्चों से कथित तौर पर भ्रामक और दबाव में बयान रिकॉर्ड कर लिए गए, जिनका इस्तेमाल बाद में वीडियो में किया गया।

वीडियो वायरल होने के बाद बढ़ी परेशानी

अगले दिन शिक्षिका को जानकारी मिली कि उनका वीडियो यूट्यूब पर अपलोड कर दिया गया है। वीडियो में उनके पेशेवर और व्यक्तिगत सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला कंटेंट दिखाया गया था। जब शिक्षिका ने वीडियो हटाने के लिए संबंधित यूट्यूबर के सहयोगी से संपर्क किया तो वीडियो हटाने से साफ इनकार कर दिया गया।

इसके बाद आरोप है कि वीडियो डिलीट करने के बदले 1.50 लाख रुपये की मांग की गई। यह कॉल स्कूल के एक अन्य स्टाफ सदस्य को की गई थी, जिससे पूरा मामला और गंभीर हो गया।

पुलिस कार्रवाई और कानूनी पहलू

पीड़िता की शिकायत पर गोमतीनगर थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई है। पुलिस का कहना है कि मामले से जुड़े सभी डिजिटल साक्ष्यों, कॉल रिकॉर्ड और वीडियो कंटेंट की जांच की जा रही है। जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।

भारतीय कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति की बिना अनुमति वीडियो रिकॉर्डिंग, विशेष रूप से महिला और बच्चों से जुड़े मामलों में, निजता के अधिकार का उल्लंघन मानी जाती है। स्कूल जैसे संरक्षित स्थानों में बिना अनुमति रिकॉर्डिंग करना कई कानूनों के तहत अपराध की श्रेणी में आता है।

स्कूल और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर सवाल

यह मामला केवल एक शिक्षिका तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं। बच्चों से जुड़े किसी भी प्रकार के वीडियो कंटेंट के लिए अभिभावकों और प्रशासन की अनुमति अनिवार्य होती है। बिना अनुमति बच्चों के बयान रिकॉर्ड करना न सिर्फ अनैतिक है बल्कि कानूनी रूप से भी गंभीर अपराध हो सकता है।

शिक्षा विभाग के नियमों के अनुसार किसी बाहरी व्यक्ति को स्कूल परिसर में प्रवेश से पहले प्रधानाध्यापक या संबंधित अधिकारी से अनुमति लेना आवश्यक है।

यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी

यूट्यूब जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म कंटेंट क्रिएटर्स को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देते हैं, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। प्लेटफॉर्म की गाइडलाइंस स्पष्ट रूप से कहती हैं कि किसी की निजता का उल्लंघन करने वाला कंटेंट हटाया जा सकता है।

ऐसे मामलों में पीड़ित व्यक्ति यूट्यूब की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर प्राइवेसी कंप्लेंट दर्ज कर सकता है। इसके अलावा साइबर क्राइम पोर्टल पर भी शिकायत की जा सकती है।

आम लोगों के लिए सबक

यह घटना आम नागरिकों, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए एक चेतावनी है कि डिजिटल दौर में अपनी निजता को लेकर सतर्क रहना कितना जरूरी है। अगर कोई व्यक्ति बिना अनुमति वीडियो बनाए या उसे वायरल करने की धमकी दे तो तुरंत कानूनी सहायता लेनी चाहिए।

सरकारी कर्मचारी होने के नाते शिक्षकों को भी अपने अधिकारों की जानकारी होना बेहद जरूरी है, ताकि वे ऐसे मामलों में सही कदम उठा सकें।

निष्कर्ष

गोमतीनगर का यह मामला दिखाता है कि कंटेंट क्रिएशन की आड़ में किसी की छवि खराब करना और पैसे की मांग करना गंभीर अपराध है। कानून ऐसे मामलों में पीड़ित के साथ खड़ा है और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर दोषियों पर सख्त कार्रवाई संभव है।

जरूरत है कि स्कूल प्रशासन, शिक्षा विभाग और पुलिस मिलकर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और सख्त निगरानी व्यवस्था लागू करें, ताकि शिक्षा का माहौल सुरक्षित बना रहे।

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