देशभर में लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों के बीच टीईटी अनिवार्यता को लेकर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। इसी कड़ी में गुरुवार को उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के शिक्षकों ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़ा प्रदर्शन किया। इस आंदोलन में प्राथमिक, जूनियर और माध्यमिक स्तर के शिक्षक शामिल हुए, जिन्होंने एक स्वर में मांग की कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की बाध्यता से मुक्त किया जाए।
शिक्षकों का कहना है कि वर्षों के अनुभव और विभागीय प्रशिक्षण प्राप्त करने के बावजूद बार-बार पात्रता परीक्षा की शर्त लगाना न केवल अनुचित है, बल्कि यह उनकी सेवा सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। यही कारण है कि यह मुद्दा अब केवल राज्य स्तर तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय स्तर का विषय बन चुका है।

देश के अलग-अलग राज्यों से पहुंचे शिक्षक
इस प्रदर्शन का नेतृत्व अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ के संयुक्त मंच द्वारा किया गया। बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से शिक्षक हजारों किलोमीटर की यात्रा कर दिल्ली पहुंचे। कई शिक्षक 1200 से 1500 किलोमीटर दूर से आए, जो यह दर्शाता है कि यह मुद्दा उनके लिए कितना गंभीर है।
शिक्षकों का कहना है कि उन्होंने स्कूलों में वर्षों तक बच्चों को शिक्षा दी है, नई-नई शैक्षिक योजनाओं को जमीन पर उतारा है और सरकार के हर मिशन में सक्रिय भूमिका निभाई है। इसके बावजूद उनकी नौकरी को टीईटी जैसी शर्तों से असुरक्षित बनाया जा रहा है, जो न्यायसंगत नहीं है।
अनुभव बनाम परीक्षा की बहस
अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील कुमार पाण्डेय ने इस दौरान कहा कि टीईटी को मूल रूप से नियुक्ति प्रक्रिया के लिए बनाया गया था, न कि सेवा में कार्यरत शिक्षकों को बार-बार परखने के लिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षक पात्रता परीक्षा एक बार ली जाने वाली परीक्षा है, जिसका उद्देश्य नए शिक्षकों के चयन में गुणवत्ता सुनिश्चित करना था।
उनका तर्क है कि जो शिक्षक शिक्षा अधिकार अधिनियम से पहले नियुक्त हुए हैं, उन्होंने लंबे समय तक सफलतापूर्वक पढ़ाया है और विभागीय प्रशिक्षण भी प्राप्त किया है। ऐसे में उनकी योग्यता पर सवाल उठाना अनुभव की अनदेखी करना है।
सरकारी योजनाओं में शिक्षकों की भूमिका
शिक्षकों ने यह भी रेखांकित किया कि निपुण भारत मिशन, पीएम श्री विद्यालय योजना और अटल आवासीय विद्यालय जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं को सफल बनाने में शिक्षकों की भूमिका केंद्रीय रही है। इन योजनाओं के तहत बुनियादी साक्षरता, गुणवत्ता आधारित शिक्षा और नवाचार को बढ़ावा दिया गया, जिसमें जमीनी स्तर पर शिक्षकों ने मेहनत की।
प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों का कहना है कि जब सरकार स्वयं उनके कार्य की सराहना करती है, तब उन्हें सेवा सुरक्षा देने के बजाय नई बाध्यताएं थोपना विरोधाभासी है।
कितने शिक्षकों की नौकरी पर असर
शिक्षक संगठनों के अनुसार, यदि टीईटी अनिवार्यता को लेकर स्पष्ट छूट नहीं दी गई, तो उत्तर प्रदेश के लगभग दो लाख शिक्षकों सहित देशभर में करीब बीस लाख शिक्षक प्रभावित हो सकते हैं। यह न केवल शिक्षकों के भविष्य का सवाल है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता से भी जुड़ा हुआ विषय है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी संख्या में अनुभवी शिक्षकों के असंतोष से स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता और छात्रों के सीखने की निरंतरता पर असर पड़ सकता है।
सरकार से क्या अपेक्षा कर रहे हैं शिक्षक
शिक्षक संगठनों की मांग है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर ठोस और स्पष्ट नीति बनाए। शिक्षा अधिकार अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से स्थायी छूट दी जाए और उनकी सेवा शर्तों को सुरक्षित किया जाए। साथ ही, भविष्य में किसी भी नई पात्रता शर्त को लागू करने से पहले शिक्षकों के संगठनों से संवाद किया जाए।
शिक्षकों ने यह भी सुझाव दिया है कि यदि गुणवत्ता मूल्यांकन आवश्यक है, तो उसके लिए प्रशिक्षण आधारित मूल्यांकन मॉडल अपनाया जाए, न कि केवल परीक्षा आधारित प्रणाली।
आधिकारिक जानकारी और आगे की राह
इस विषय से जुड़ी किसी भी आधिकारिक सूचना के लिए शिक्षक और अभ्यर्थी शिक्षा मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट https://www.education.gov.in और राष्ट्रीय शिक्षा नीति से संबंधित दस्तावेजों को देख सकते हैं। राज्य स्तर पर संबंधित शिक्षा विभाग की वेबसाइट से भी नवीनतम आदेश और परिपत्र प्राप्त किए जा सकते हैं।
निष्कर्ष
टीईटी अनिवार्यता से छूट की मांग केवल एक परीक्षा से जुड़ा सवाल नहीं है, बल्कि यह अनुभव, सेवा सुरक्षा और शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ा मुद्दा है। वर्षों से कक्षा में पढ़ा रहे शिक्षकों की मांग है कि उनके अनुभव को सम्मान मिले और नीतियां वास्तविक जमीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाई जाएं। यदि सरकार और शिक्षक संगठनों के बीच सकारात्मक संवाद होता है, तो इसका लाभ न केवल शिक्षकों को, बल्कि देश की पूरी शिक्षा व्यवस्था को मिलेगा।