लखनऊ में गुरुवार को उस समय माहौल गरमा गया, जब आठवें वेतन आयोग के दायरे से पेंशन और पेंशनरी लाभों को बाहर रखे जाने के प्रस्ताव के खिलाफ सेवानिवृत्त डिप्लोमा इंजीनियर सड़कों पर उतर आए। केडी सिंह बाबू स्टेडियम के निकट स्वर्गीय बीएन सिंह की प्रतिमा के समक्ष जुटे पेंशनरों ने सरकार के फैसले पर गहरी नाराजगी जताई और इसे सेवानिवृत्त कर्मचारियों के साथ अन्याय बताया।
पेंशनरों का कहना था कि पेंशन कोई सरकारी अनुग्रह या सहायता नहीं है, बल्कि यह वह राशि है जो सेवा काल के दौरान कर्मचारियों के वेतन से काटी जाती है और भविष्य की सुरक्षा के लिए सुरक्षित रखी जाती है। ऐसे में वेतन आयोग से पेंशनरों को अलग करना उनके संवैधानिक और नैतिक अधिकारों का हनन है।

पेंशनरों में बढ़ती असुरक्षा की भावना
सेवानिवृत्त कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग पहले से ही महंगाई, चिकित्सा खर्च और सामाजिक सुरक्षा को लेकर चिंतित है। बढ़ती उम्र के साथ आय के सीमित साधनों में जीवन यापन करना आसान नहीं होता। ऐसे में वेतन आयोग जैसे महत्वपूर्ण ढांचे से पेंशनरों को बाहर रखने की चर्चा ने उनकी आशंकाओं को और गहरा कर दिया है।
प्रदर्शन में शामिल पेंशनरों ने कहा कि जब भी नया वेतन आयोग गठित होता है, तो उसका सीधा असर केवल कार्यरत कर्मचारियों पर ही नहीं, बल्कि पेंशन पाने वाले लाखों बुजुर्गों पर भी पड़ता है। अगर पेंशन को वेतन आयोग से अलग कर दिया गया, तो भविष्य में पेंशन संशोधन, महंगाई राहत और अन्य लाभों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
संगठन ने सरकार से उठाए सवाल
सेवानिवृत्त डिप्लोमा इंजीनियर्स कल्याण संघ के प्रांतीय अध्यक्ष इं. आरके भाटिया ने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से आठवें वेतन आयोग के लिए जिन विषयों पर विचार किया जा रहा है, उनमें पेंशनरों को अलग रखना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि संसद के उच्च सदन में इस मुद्दे पर पूछे गए सवालों का सरकार की ओर से स्पष्ट और संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया, जिससे पेंशनरों में भ्रम और असंतोष बढ़ रहा है।
संघ के कार्यकारी अध्यक्ष इं. दिवाकर राय ने कहा कि पेंशनर वही लोग हैं, जिन्होंने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष सरकार और जनता की सेवा में लगाए हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उनके हितों की अनदेखी करना न केवल अनुचित है, बल्कि सामाजिक न्याय की भावना के भी खिलाफ है।
15 सूत्रीय ज्ञापन के जरिए रखी मांग
प्रदर्शन के दौरान पेंशनरों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को संबोधित 15 सूत्रीय ज्ञापन भेजा। ज्ञापन में मांग की गई कि आठवें वेतन आयोग के दायरे में पेंशन और सभी पेंशनरी लाभों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। साथ ही यह भी आग्रह किया गया कि पेंशन संशोधन की प्रक्रिया पारदर्शी हो और इसमें पेंशनर संगठनों की राय को भी महत्व दिया जाए।
महासचिव इं. बलवंत प्रसाद ने कहा कि यदि सरकार ने समय रहते इस मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो अन्य पेंशनर संगठनों के साथ मिलकर बड़े स्तर पर आंदोलन की रणनीति बनाई जाएगी। उनका कहना था कि यह लड़ाई केवल डिप्लोमा इंजीनियरों की नहीं, बल्कि देश के करोड़ों पेंशनरों की है।
पहले के वेतन आयोगों से जुड़ा अनुभव
विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले सभी वेतन आयोगों में पेंशन और वेतन के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की गई है। सातवें वेतन आयोग में भी पेंशन पुनरीक्षण और समानता के सिद्धांत पर जोर दिया गया था। पेंशनरों का तर्क है कि अगर पहले ऐसा संभव था, तो आठवें वेतन आयोग में उन्हें अलग क्यों किया जा रहा है।
कई पेंशनर यह भी मानते हैं कि पेंशन को वेतन आयोग से अलग करना भविष्य में सामाजिक असमानता को बढ़ा सकता है, क्योंकि कार्यरत कर्मचारियों और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बीच आर्थिक अंतर लगातार बढ़ता जाएगा।
आधिकारिक जानकारी और आगे की दिशा
फिलहाल आठवें वेतन आयोग को लेकर केंद्र सरकार की ओर से अंतिम रूप से कोई अधिसूचना जारी नहीं हुई है। पेंशन से जुड़े नियम और नीतियां मुख्य रूप से भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और कार्मिक एवं पेंशन विभाग की आधिकारिक वेबसाइटों पर प्रकाशित की जाती हैं। पेंशनरों को सलाह दी जाती है कि वे केवल अधिकृत सरकारी स्रोतों से ही जानकारी प्राप्त करें और किसी भी अफवाह पर भरोसा न करें।
निष्कर्ष
आठवें वेतन आयोग से पेंशनरों को अलग रखने का मुद्दा अब केवल एक संगठन तक सीमित नहीं रह गया है। यह प्रश्न सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक जीवन और बुजुर्गों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। अगर सरकार समय रहते पेंशनरों की चिंताओं को समझकर ठोस निर्णय लेती है, तो न केवल विवाद सुलझ सकता है, बल्कि शासन और सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बीच विश्वास भी मजबूत होगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस संवेदनशील विषय पर क्या रुख अपनाती है और पेंशनरों को कितना भरोसा दिला पाती है।